राजद्रोह कानून को लेकर दिल्ली की एक अदालत की यह टिप्पणी अहम है कि समाज में शांति व कानून-व्यवस्था बरकरार रखने के मकसद से यह कानून सरकार के हाथ में ताकतवर औजार है, लेकिन इसका इस्तेमाल असंतुष्टों को चुप करने के लिए नहीं किया जा सकता। इस टिप्पणी के बाद राजद्रोह कानून के दुरुपयोग को लेकर फिर सवाल खड़े हो गए हैं। पिछले वर्षों में सरकार विरोधी सामग्री लिखने, बोलने या समर्थन करने पर आइपीसी की धारा 124(ए) के तहत बड़ी संख्या में राजद्रोह के मामले दर्ज हुए हैं।
यह एक गैरजमानती अपराध है। दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को तीन साल तक की सजा हो सकती है। संबंधित व्यक्ति सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य हो सकता है। इसीलिए जब-तब इस कानून के दुरुपयोग की बातें भी होती रहती हैं। विधि आयोग भी तीन बार इस धारा की समीक्षा की बात कह चुका है। यह भी तथ्य है कि केंद्र सरकार ने जुलाई 2019 में राजद्रोह कानून खत्म करने से यह कहते हुए साफ मना कर दिया था कि राष्ट्र-विरोधी, पृथकतावादी और आतंककारी तत्वों से निपटने के लिए इस कानून की जरूरत है। दूसरी ओर इस कानून को लेकर सरकारों के नजरिए की तस्वीर देखिए। तमिलनाडु के कुडनकुलम में एक गांव पर तो इसलिए देशद्रोह कानून थोप दिया गया, क्योंकि वे वहां परमाणु सयंत्र बनाए जाने के पक्ष में नहीं थे। इसी तरह 2014 में झारखंड में विस्थापन का विरोध कर रहे आदिवासियों पर भी देशद्रोह कानून लगा दिया गया था। 2020 में राजद्रोह के 70 से अधिक मामले सामने आए। जबकि 2019 में देशभर में 93 मामले दर्ज हुए। इनमें कर्नाटक और उत्तर प्रदेश के लोग सबसे ज्यादा प्रभावित थे। संविधान का अनुच्छेद-19 नागरिकों को अभिव्यक्ति की आजादी देता है, किंतु इस पर निश्चित प्रतिबंध भी हैं।
यह समझना होगा कि सरकारें तो आती-जाती रहती हैं, लेकिन देश संविधान और कानून से चलता है। राष्ट्र अथवा देश एक भावना है, जिसके मूल में राष्ट्रीयता का भाव होता है। इसलिए कभी-कभी राजद्रोह, राष्ट्रभक्ति के लिए आवश्यक हो सकता है। सरकारों को राजद्रोह कानून के दुरुपयोग से बचना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने भी व्यवस्था दी थी कि सरकार की आलोचना या प्रशासन पर टिप्पणी से राजद्रोह का मुकदमा नहीं बनता। यह तभी बनेगा, जब किसी व्यक्ति या किसी समूह द्वारा देश की क्षेत्रीय अखंडता और सम्प्रभुता पर सवाल खड़ा किया गया हो। गणतंत्र में संवैधानिक मूल्यों की रक्षा जरूरी है, अन्यथा हम में और राजतंत्र में क्या अंतर रह जाएगा।
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