विनय उपाध्याय
झील के गाल पर गुलाल मलता सूरज पलक झपकते ही पश्चिम में ओझल हो गया, लेकिन आसमान से उतरती सलोनी शाम ने तिरछी आंखों से इस फागुनी अठखेली को निहार लिया। वह भी पूरी सज-धज के साथ उत्सव मनाना चाहती है। वसंत की इस गोधूलि को वह विंध्यप्रदेश की उस घाटी में जीना चाहती है, जहां घुंघरुओं की रुनझुन देह गतियों के सुंदर छंद रच रही है। मंदिर का किनारा, मुक्ताकाशी मंच, हवा की हौली-हौली हिलोरें, फलक पर खिलखिलाता चांद...। सहसा दूर ठिठके अंधेरे को चीरकर मंच पर प्रकट होती है नर्तकी। मानो सांझ एक सुंदर परी बनकर धरती पर उतर आई हो। प्रेम प्रतिमाओं की प्रसिद्ध नगरी खजुराहो की वादियों में हर साल वसंत ऐसा ही दिलकश रंग उड़ेलता है। आगामी 20 से 26 फरवरी तक खजुराहो लय-ताल के इसी आगोश में खो जाने को तैयार है। भरतनाट्यम, कथक, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी और सत्रिया जैसी वे सभी सात प्रमुख शास्त्रीय नृत्य शैलियां इस रंग पटल पर अपने रूपक रचेंगी जिन्हें बरसों की साधना में विरासत ने गढ़ा। सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा बनाया। यह उत्सव तीन बरस बाद अपने सफर की आधी सदी पूरी कर लेगा।
स्मृतियों को टटोलें तो खजुराहो नृत्य समारोह को स्थापित करने के पीछे जो संकल्प था, नृत्य समारोह उसे पूरा करने में सफल हुआ। खजुराहो के नृत्य परिसर में उमडऩे वाले अनेक देशी-विदेशी कला प्रेमी इस उत्सव के शिल्प और उसके कल्पनाशील संयोजन पर रीझते रहे हैं। मंदिरों की पृष्ठभूमि उन्हें नृत्य प्रस्तुतियों के साथ रूहानी रिश्ता जोडऩे में मदद करती है। भव्यता और उच्च स्तरीय इंतजामों के बावजूद अभी नृत्य से स्थापत्य का तादात्म्य नहीं जुड़ पाया है। ढलती शाम के साथ घिरते अंधेरे में मंदिर ओझल हो जाते हैं और नृत्य और मंदिर की निकटता का चाक्षुष आनंद दर्शक नहीं ले पाता। हालांकि दर्शकों को 900 से 1400वीं सदी के काल में बनी इन मूर्तियों में देह-राग का संगीत सुनाई पड़ सकता है, पर अध्यात्म का सिरा पकड़कर चलें तो ये प्रतिमाएं मोक्ष की ओर ले जाती हैं। मूर्धन्य नृत्य गुरू पंडित बिरजू महाराज कहते हैं- 'खजुराहो में मंदिर और मन की साधना के मंदिर का मिलन होता है।' ...तो खजुराहो आपकी बाट जोह रहा है।
(लेखक कला, साहित्य समीक्षक एवं टैगोर विश्व कला एवं संस्कृति केन्द्र के निदेशक हैं)
from Patrika : India's Leading Hindi News Portal https://ift.tt/3s0UyhK
via Top News in Hindi


0 Comments