लोकतान्त्रिक सूचकांक की वैश्विकरैंकिंग में भारत का एक वर्ष में दो पायदान नीचे जाना हम 138 करोड़ भारतीयों के लिए अच्छी खबर नहीं है। यह इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि एक तो यह रैंकिंग विश्व प्रतिष्ठित इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट ने की है और दूसरे- इसमें हम पिछले कुछ वर्षों से लगातार नीचे जा रहे हैं। यदि इस संगठन के पिछले आंकड़ों को देखें तो 2014 में जहां हम 27वें स्थान पर थे, आज 53वें पर पहुंच गए हैं। बेशक चीन, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश और भूटान जैसे हमारे पड़ोसी देश हमसे भी नीचे हैं, लेकिन यह हमारे लिए संतोष की बात नहीं हो सकती।

हमारे लोकतंत्र का डंका दुनिया में बजता है। चीन और पाकिस्तान तो माने ही अधिनायकवादी जाते हैं। यह दर्द तब और बढ़ जाता है, जब सर्वे के अनुसार 'पूर्ण लोकतंत्र' वाले 23 देशों में हमारा नाम कहीं नजर नहीं आता। भारत उन 52 देशों में है, जिन्हें 'दोषपूर्ण लोकतंत्र' की श्रेणी में रखा गया है। इससे पहले भी हमारा नाम किसी न किसी क्षेत्र की रैंकिंग में नीचे गया है, लेकिन इस पर गंभीरता से ध्यान देना इसलिए जरूरी है क्योंकि इससे हमारे लोकतंत्र की प्रतिष्ठा जुड़ी है। हम इसे असत्य, आधारहीन व देश की छवि खराब करने का अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र भी बता सकते हैं। टीवी की बहसों में काबिल विश्लेषक भारत और पाकिस्तान-चीन जैसी पालाबन्दी कर सकते हैं। जरूरत खास तौर से उन बिंदुओं पर आत्मावलोकन की है, जिन पर यूनिट ने यह रैंकिंग दी है। पक्ष-विपक्ष की पालाबन्दी भूल हमें सोचना चाहिए कि क्या वाकई इन वर्षों में हम लोकतान्त्रिक मूल्यों से पीछे हटे हैं? क्या वास्तव में देश में नागरिकों की स्वतंत्रता कमजोर हुई है? ईमानदारी से विश्लेषण करेंगे तो पाएंगे कि कारण चाहे जो हों, दोषी कोई भी हो पर कहीं न कहीं इन पर हमारी प्रतिबद्धता कमजोर पड़ी है। ज्यादा पीछे जाकर और लम्बी सूची न बनाकर हम किसान आंदोलन के दौरान नेटबंदी-कील बंदी और बिहार व उत्तराखंड में पुलिस द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए प्रतिबंधों को ही देखें तो लगेगा कि लोकतंत्र के प्रति हमारा समर्पण कमजोर पड़ रहा है।

यदि सोशल मीडिया पर राजनेताओं-अधिकारियों को लेकर लिखी गई टिप्पणियां देशद्रोह मानकर किसी की गिरफ्तारी अथवा उसे पासपोर्ट जैसे दस्तावेज जारी करने का आधार बनेंगी, तब तो लोकतंत्र मजबूत हो लिया! देशद्रोह जितना गंभीर आरोप है, उतनी ही गंभीरता से लगना चाहिए। इसे हल्के में लेने से नागरिक स्वतंत्रता पर आघात व्यक्ति, देश और लोकतंत्र को कितना नुकसान पहुंचाएगा, हम सोच भी नहीं सकते। आवश्यकता समय से सावधान होने की है।



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